स्वस्थ लोकतंत्र या सम्मान की होड़? फैसला पाठक स्वयं करें श्रीकांत वर्मा स्मृति अवार्ड के बहाने जौनपुर में पत्रकारिता पर सवाल मनीष श्रीवास्तव...
स्वस्थ लोकतंत्र या सम्मान की होड़? फैसला पाठक स्वयं करें
श्रीकांत वर्मा स्मृति अवार्ड के बहाने जौनपुर में पत्रकारिता पर सवाल
मनीष श्रीवास्तव
जौनपुर। नगर के एक होटल में आयोजित पत्रकार सम्मान समारोह, बाहर से भले ही गरिमामय दिखा हो, लेकिन भीतर से यह पत्रकारिता की मौजूदा दशा और दिशा पर गंभीर सवाल खड़े करता नजर आया। श्रीकांत वर्मा स्मृति अवार्ड के नाम पर हुए इस आयोजन ने सम्मान से ज़्यादा, पत्रकारों और सत्ता के रिश्तों की असहज सच्चाई को उजागर किया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ पत्रकार अशोक वानखेडे ने मंच से भले ही सत्ता से सवाल पूछने की बात कही, लेकिन विडंबना यह रही कि यह “सत्ता से असहज करने” का संदेश एक ऐसे होटल के मंच से दिया गया, जहां व्यवस्थाओं की चकाचौंध और प्रायोजित गरिमा सवालों को खुद असहज कर रही थी।
वानखेडे ने कहा जिस दिन पत्रकार सत्ता को असहज करना छोड़ देगा, उसी दिन लोकतंत्र खोखला हो जाएगा।”
लेकिन सवाल यह है कि क्या लगातार बढ़ते ऐसे सम्मान समारोह पत्रकारों को असहज बना रहे हैं या उन्हें सहज चुप्पी की ओर ढकेल रहे हैं?सम्मान स्वरूप साल, डायरी और स्मृति चिन्ह भेंट किए गए। मगर मंच से उठे विचारों और ज़मीनी हकीकत के बीच की खाई साफ दिखी। जिन बातों को चेतावनी कहा गया, वही बातें आयोजन की पृष्ठभूमि में खुद मज़ाक बनती नजर आईं।
अशोक वानखेडे ने पत्रकारिता को प्रचार में बदलने की साजिश की बात की, लेकिन यह भी सच है कि आज प्रचार तक पहुंचने का सबसे आसान रास्ता सम्मान समारोह बनता जा रहा है।
“जो खबर सत्ता को परेशान नहीं करती, उस पर सत्ता को कोई आपत्ति नहीं होती
यह वाक्य जितना तीखा है, उतना ही इन आयोजनों पर भी लागू होता दिखा।दिवंगत साहित्यकार श्रीकांत वर्मा को याद करते हुए कहा गया कि वे सत्ता के भीतर रहकर सत्ता के खिलाफ लिखते थे। लेकिन आज उनके नाम पर दिए जा रहे सम्मान कहीं न कहीं यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या यह विरासत सवाल पूछने वालों की है या तालियों में सहज हो जाने वालों की?
सम्मान को उन पत्रकारों के लिए बताया गया जो सरकारी बयान से आगे जाकर सच्चाई खोजने का जोखिम उठाते हैं, मगर जोखिम और रिवॉर्ड के बीच का फर्क इस मंच से धुंधला पड़ता दिखा।
इस आयोजन ने जौनपुर में चल रही एक नई परंपरा को भी रेखांकित कर दिया।पहले लकी ड्रा के ज़रिए पत्रकारों पर कृपा बरसाने वाले व्यापारी, और अब एक होटल व्यवसायी भी पत्रकारों के “सम्मान” में मैदान में उतर आए हैं।
लगता है मानो पत्रकारों का सम्मान अब सामाजिक सरोकार कम और प्रतिस्पर्धा का विषय ज़्यादा बनता जा रहा है।
होटल व्यवसायी द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में जिले भर के पत्रकारों की “स्वतःस्फूर्त” भीड़ देखने को मिली। घोषित उद्देश्य भले ही निष्पक्ष पत्रकारिता और जनहित बताया गया हो, लेकिन चमक-दमक देखकर यह तय करना मुश्किल था कि सम्मान पत्रकारिता का हो रहा है या संख्या का।
वक्ताओं ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भूमिका पर लंबी-लंबी बातें कीं, लेकिन यह भी साफ दिखा कि आजकल पत्रकारों तक पहुंचने का सबसे सरल माध्यम सवाल नहीं, बल्कि सम्मान समारोह बनता जा रहा है।
पत्रकारों ने भी खुले दिल से ऐसे आयोजनों की सराहना की और माना कि इससे मनोबल बढ़ता है। हालांकि, यह संदेश भी अनकहे रूप में चला गया कि जनपद में पत्रकारों की पहचान अब कलम से कम और आयोजनों से ज़्यादा तय होने लगी है।
कुल मिलाकर, यह आयोजन पत्रकारिता के सम्मान से ज़्यादा उसके आत्ममंथन की जरूरत को उजागर करता है।
सम्मान बढ़ रहे हैं, मंच बढ़ रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या सवाल भी उतने ही तेज़ हो रहे हैं?
स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह संकेत कितना शुभ है—इसका फैसला पाठक स्वयं करें।

COMMENTS